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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पटना

स्वर्ण शक्ति: धान की यह किस्म किसानों की तकदीर बदल देगी

स्वर्ण शक्ति: धान की यह किस्म किसानों की तकदीर बदल देगी

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार परंपरागत धान की खेती से एक किलोग्राम चावल उपजाने में लगभग 3000 से 5000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने कम पानी में पैदा होने वाले धान की किस्म विकसित की है, जो किसानों के लिए बड़ा उपहार साबित हो सकती है। धान की इस किस्म का नाम है स्वर्ण शक्ति।

स्वर्ण शक्ति धान किस्म

पशु विज्ञान विश्वविद्यालय पटना के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र जमुई ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पटना के विज्ञानियों के साथ मिलकर कई सालों के शोध व परिक्षण के बाद स्वर्ण शक्ति किस्म को विकसित किया है। इसे बाजार में उतारने की अनुमति फसल बीज अधिसूचना केंद्र उप समिति व राज्य बीज उप समिति ने दे दी है। खरीफ सीजन से ही किसान इसकी खेती कर सकते हैं। स्वर्ण शक्ति धान कम पानी में या असिंचित क्षेत्र में भी आसानी से उपजाई और अच्छी पैदावार पाई जा सकती है।

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स्वर्ण शक्ति किस्म की मुख्य विशेषतायें

• स्वर्ण शक्ति किस्म की धान पर सूखे का असर नहीं होता है। • स्वर्ण शक्ति किस्म की धान पौधे 15 दिन तक ओलावृष्टि को सहने में सक्षम है। • यदि बारिश कम होती है तो भी किसान को नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा। • पानी की खपत कम होगी जिससे खेती की लागत कम होगी। • स्वर्ण शक्ति मध्यम अवधि की प्रजाति है जो 115-120 दिन में तैयार हो जाती है। • स्वर्ण शक्ति प्रजाति से 45 से 50 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

भूमि की तैयारी कैसे करें

सबसे पहले खेत की एक गहरी जुताई करनी चाहिए, इससे खरपतवार, कीट और रोगों के प्रबंधन में सहायता मिलती है। धान की सीधी बुआई द्वारा खेती करने के लिए एक बार मोल्ड हल की सहायता से जुताई करके फिर डिस्क हैरो और रोटावेटर चलाने के बाद धान की सीधी बुआई द्वारा खेती करें। ऐसा करने से पूरे खेत में बीजों का एक समान अंकुरण, जड़ों का सही विकास, सिंचाई के जल का एक समान वितरण होने से पौधों का विकास बहुत अच्छा होगा और अच्छी उपज हासिल होगी।

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बुवाई का समय

बुआई का सबसे अच्छा समय जून के दूसरे सप्ताह से लेकर चौथे सप्ताह तक होता है। लेकिन किसान भाई जुलाई माह में भी इसकी बुवाई कर सकते हैं।

स्वर्ण शक्ति किस्म की बुआई का तरीका

स्वर्ण शक्ति धान की सीधी बुआई हाथ से अथवा बीज-सह-उर्वरक ड्रिल मशीन द्वारा की जा सकती है। करीब 25-30 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की बीज दर के साथ 3-5 से.मी. गहरी हल-रेखाओं में 20 से.मी. की दूरी पर पंक्तियों में बुवाई की जाती है।

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खाद व उर्वरक की मात्रा

धान के पौधों के उचित विकास के लिए प्रति हैक्टेयर 120 किलोग्राम नाईट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। बुआई के लिए भूमि की अंतिम तैयारी के समय फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी खुराक और नाईट्रोजन उर्वरक की केवल एक तिहाई मात्रा को खेत में मिला देना चाहिए। बाकि नाईट्रोजन को दो बराबर भागों में बांटकर, एक भाग को बुआई के 40-50 दिनों बाद कल्ले (टिलर) आने के समय तथा दूसरे भाग को बुआई के 55-60 दिनों बाद बाली आने के समय देना चाहिए।

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सिंचाई कब कब करें

बिना कीचड़ और बिना जल जमाव किये स्वर्ण शक्ति धान की खेती सीधी बुआई करके की जाती है। स्वर्ण शक्ति सूखा सहिष्णु एरोबिक प्रजाति है, यदि फसल के दौरान सामान्य वर्षा हो और सही रूप से खेत में वितरित हो तो फसल को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। सूखे की स्थिति में फसल को विकास की महत्वपूर्ण अवस्थाओं जैसे बुआई के बाद, कल्ले निकलते समय, गाभा फूटते समय, फूल लगते समय एवं दाना बनते समय मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी होता है।

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कैसे करें खरपतवार नियंत्रण

धान की सीधी बुआई करने पर खेतों में मोथा, दूब, जंगली घास, सावां, सामी आदि खरपतवार का प्रकोप काफी बढ़ जाता है, जिससे फसल को नुकसान होता हैं। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए बुवाई के एक या दो दिनों के अंदर ही पेंडीमेथलीन का 1 किलोग्राम सक्रिय तत्व / हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव करना चाहिए। इसके बाद बिस्पैरिबक सोडियम का 25 ग्राम सक्रिय तत्व/ हैक्टेयर की दर से बुआई के 18-20 दिनों के अंदर छिडक़ाव करना चाहिए। आवश्यक हो तो बुआई के 40 दिनों बाद और 60 दिनों बाद निराई की जा सकती है।

किसान भाई ध्यान दें, खरीफ की फसलों की बुवाई के लिए नई एडवाइजरी जारी

किसान भाई ध्यान दें, खरीफ की फसलों की बुवाई के लिए नई एडवाइजरी जारी

नई दिल्ली। खरीफ की फसलों की बुवाई के लिए नई एडवाइजरी जारी हो गई है। किसान भाई ध्यान से इस नई एडवाइजरी के बारे में विस्तार से जानें. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने किसानों को चारे और सब्जियों की फसल की अच्छी खेती को लेकर एडवाइजरी जारी की है। 

एडवाइजरी के अनुसार यह समय चारे की फसल ज्वार की बुवाई के लिए उपयुक्त है। खेत में पर्याप्त नमी को ध्यान में रखते हुए किसान पूसा चरी-9, पूसा चरी-6 या अन्य सकंर किस्मों की बुवाई तत्काल शुरू कर सकते है। 

इसके बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर 40 किलोग्राम से 42 किलोमग्राम तक होनी चाहिए। लोबिया की बुवाई का भी यह ठीक समय है। 

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक इस मौसम में किसान खरीफ प्याज, सेम, पालक, लोबिया, भिंडी, चौलाई आदि सब्जियों की बुवाई कर सकते हैं। 

लेकिन ध्यान रहे कि खेत में पर्याप्त नमी रहे। इसके साथ ही बीज किसी प्रमाणित स्रोत से ही खरीदें, ताकि नकली बीज होने की गुंजाइश कम हो।

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कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो कद्दूवर्गीय सब्जियों की वर्षाकालीन फसल की बुवाई शुरू हो जानी चाहिए। लौकी की उन्नत किस्में पूसा नवीन और पूसा समृद्वि हैं। 

सीताफल की पूसा विश्वास, करेला की पूसा विशेष, पूसा दो मौसमी, पूसा विकास, तुरई की पूसा चिकनी धारीदार, पूसा नसदार तथा खीरा की पूसा उदय, पूसा बरखा आदि किस्मों की बुवाई शुरू कर सकते हैं। हालांकि यह ध्यान रहे कि मिट्टी ऐसी हो जिसमें बीज का जमाव बेहतर ढंग से हो सके।

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बाग लगाने वाले गड्ढ़ों में गोबर की खाद डालें

- जिन गड्ढ़ों में फसल उगाने की तैयारी चल रही है। उनमें गोबर की खाद जरूर डालें, ताकि दीमक तथा सफेद लट से बचा जा सके। 

गोबर की सड़ी-गली खाद के प्रयोग करने से भूमि जल धारण और पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है। मिट्टी जांच के बाद उर्वरकों की संतुलित मात्रा का उपयोग करें।

पोटाश की मात्रा जरूर बढ़ाएं

इन फसलों को पानी की आवश्यकता होती है। फसल में पानी की कमी और सूखा से लड़ने के लिए पोटाश (Potash) की मात्रा अधिक होनी चाहिए। वर्षा आधारित एवं बारानी क्षेत्रों में भूमि में नमी के लिए पलवार का प्रयोग करना लाभदायक होगा।

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बारिश की आशंका को देखते हुए सभी किसानों को सलाह दी जाती है कि फसलों पर किसी प्रकार का छिड़काव न करें। साथ ही खड़ी फसलों व सब्जियों एवं नर्सररियों में उचित प्रबंध करें। ------ लोकेन्द्र नरवार

जानिये कम लागत वाली मक्का की इन फसलों को, जो दूध के जितनी पोषक तत्वों से हैं भरपूर

जानिये कम लागत वाली मक्का की इन फसलों को, जो दूध के जितनी पोषक तत्वों से हैं भरपूर

जी हां बात बिलकुल सही है, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) के भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा (ICAR-Vivekananda Parvatiya Krishi Anusandhan Sansthan, Almora) ने यह उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने बायो-फोर्टिफाईड मक्का (Maize) की नई किस्में जारी की हैं, जो पोषक तत्वों से भरपूर हैं। अपने पोषक तत्वों के कारण मक्का की यह नई किस्में अन्य प्रचलित किस्मों से बहुत भिन्न हैं।

अंतर के कारण

मक्का की चलन में उगाई जाने वाली दूसरी किस्मों में अमीनो अम्ल (amino acid) मुख्य तौर पर प्रोटीन ( पोषक तत्व ) जैसे ट्रिप्टोफैन व लाइसीन की कमी होती है। विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने पारंपरिक एवं सहायक चयन विधि के माध्यम से इस कमी को पूरा किया है।

ग्लास फुल दूध जितना हेल्दी !

संस्थान ने गुणवत्ता युक्त प्रोटीन से लैस मक्का की इन खास किस्मों में विशिष्ट अमीनो अम्ल की मात्रा में सुधार किया है। इन विकसित किस्मों में इसकी मात्रा सामान्य मक्का से 30-40 फीसदी तक ज्यादा है। मतलब उन्नत प्रजाति के मक्के में पोषण की मात्रा लगभग स्वस्थ जीव के दूध के बराबर है!

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क्यूपीएम प्रजाति (QPM - Quality protein maize)

विवेकानन्द कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा ने मक्के के जिन खास किस्मों को विकसित किया है, उनको समितियों का भी अनुमोदन मिला है। संस्थान में विकसित की गई एक क्यूपीएम प्रजाति को केंद्रीय प्रजाति विमोचन समिति ने उत्तर पश्चिमी तथा उत्तर पूर्वी पर्वतीय क्षेत्रों, जबकि दो क्यूपीएम प्रजातियों को राज्य बीज विमोचन समिति ने जारी किया है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की जैविक दशाओं को ध्यान में रखकर अप्रैल '2022 में इन्हें जारी किया गया था।

मक्का कार्यशाला के परिणाम :

कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित प्रजातियों में शामिल, वीएल क्यूपीएम हाइब्रिड 45 मक्का प्रजाति (VL QPM Hybrid 45 Makka) की पहचान अप्रैल 2022 में हुई थी। दी गई जानकारी के अनुसार, 65वीं वार्षिक मक्का कार्यशाला में इन्हें तैयार किया गया।

इन प्रदेशों की जलवायु का ध्यान :

उत्तर पश्चिमी पर्वतीय अंचल (जम्मू व कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड) एवं उत्तर पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र खास तौर पर असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम व त्रिपुरा की जलवायु के हिसाब से इनको तैयार किया गया था।

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बीमारियों से लड़ने में कारगर :

संस्थान की इस प्रजाति में टर्सिकम व मेडिस पर्ण झुलसा तरह की बीमारियों के लिए मध्यम प्रतिरोधकता भी है।

अगेती की प्रकृति वाली प्रजाति

वीएल क्यूपीएम हाइब्रिड 61 (VL QPM Hybrid 61) अगेती यानी जल्द मुनाफा देने वाली प्रजाति है, जो 85 से 90 दिन में तैयार हो जाती है।

परीक्षणों के परिणाम

जांच परीक्षणों की बात करें तो राज्य-स्तरीय समन्वित परीक्षणों में इसके बेहतर परिणाम मिले हैं। जांच में इसकी औसत उपज लगभग साढ़े चार हजार किलोग्राम है, जिसमेें ट्रिप्टोफैन, लाइसीन व प्रोटीन की मात्रा क्रमश: 0.76, 3.30 व 9.16 प्रतिशत है। तो किसान भाई, आप भी हो जाएं तैयार, दुग्ध जितने पोषण से लैस, कम लागत वाली मक्के की इन फसलों से हेल्दी मुनाफा कमाने के लिए !
धान की खड़ी फसलों में न करें दवा का छिड़काव, ऊपरी पत्तियां पीली हो तो करें जिंक सल्फेट का स्प्रे

धान की खड़ी फसलों में न करें दवा का छिड़काव, ऊपरी पत्तियां पीली हो तो करें जिंक सल्फेट का स्प्रे

वर्तमान में खरीफ फसल की बुआई हो चुकी है और फसल लहलाने भी लगी है। ऐसे में किसान अब फसल को सहेजने में लगे हुए हैं। किसान उन्हें कीट और अन्य बीमारियों से बचाने के लिये कई जतन कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) ने किसानों के लिए मौसम आधारित कृषि सलाह जारी की है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की मौसम आधारित कृषि सलाह

वर्षा के पूर्वानुमान को ध्यान में रखते हुए सभी किसानों को सलाह है की किसी प्रकार का छिड़काव ना करें और खड़ी फसलों व सब्जी नर्सरियों में उचित प्रबंधन रखे।

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दलहनी फसलों व सब्जी नर्सरियों में जल निकास की उचित व्यवस्था करें।

धान की फसल में यदि पौधों का रंग पीला पड़ रहा हो और पौधे की ऊपरी पत्तियां पीली और नीचे की हरी हो, तो इसके लिए जिंक सल्फेट (हेप्टा हाइडेट्र 21 प्रतिशत) 6 किग्रा/हैक्टेयर की दर से 300 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करें। इस मौसम में धान की वृद्धि होती इसलिए फसल में कीटों की निगरानी करें। तना छेदक कीट की निगरानी के लिए फिरोमोन प्रपंच -3-4 /एकड़ लगाए।
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इस मौसम में किसान गाजर की (उन्नत किस्म - पूसा वृष्टि) बुवाई मेड़ों पर कर सकते हैं। बीज दर 0-6.0 कि.ग्रा. प्रति एकड़। बुवाई से पूर्व बीज को केप्टान - 2.0 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचार करें और खेत में देसी खाद और फास्फोरस उर्वरक अवश्य डालें। जिन किसानों की टमाटर, हरी मिर्च, बैंगन व अगेती फूलगोभी की पौध तैयार है,

वे मौसम को देखते हुए रोपाई मेड़ों पर (ऊथली क्यारियों) पर करें और जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें।

इस मौसम में किसान ग्वार (पूसा नव बहार, दुर्गा बहार), मूली (पूसा चेतकी), लोबिया (पूसा कोमल), भिंडी (पूसा ए-4), सेम (पूसा सेम 2, पूसा सेम 3), पालक (पूसा भारती), चौलाई (पूसा लाल चौलाई, पूसा किरण) आदि फसलों की बुवाई के लिए खेत तैयार हो तो बुवाई ऊंची मेंड़ों पर कर सकते हैं। बीज किसी प्रमाणित स्रोत से ही खरीदें। जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। किसान वर्षाकालीन प्याज की पौध की रोपाई इस समय कर सकते हैं। जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। इस मौसम में किसान स्वीट कोर्न (माधुरी, विन ऑरेंज) और बेबी कोर्न (एच एम-4) की बुवाई कर सकते हैं।
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जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। कद्दूवर्गीय और दूसरी सब्जियों में मधुमक्खियों का बडा योगदान है क्योंकि, वे परागण में सहायता करती है इसलिए जितना संभव हो मधुमक्खियों के पालन को बढ़ावा दें। कीड़ों और बीमारियों की निरंतर निगरानी करते रहें, कृषि विज्ञान केन्द्र से सम्पर्क रखें व सही जानकारी लेने के बाद ही दवाईयों का प्रयोग करें। किसान प्रकाश प्रपंश (Light Trap) का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए एक प्लास्टिक के टब या किसी बड़े बरतन में पानी और थोडा कीटनाशक दवाई मिलाकर एक बल्ब जलाकर रात में खेत के बीच में रखे दें। प्रकाश से कीट आकर्षित होकर उसी घोल पर गिरकर मर जाएंगे। इस प्रपंश से अनेक प्रकार के हानिकारक कीटों मर जाते हैं। गेंदा के फूलों की (पूसा नारंगी) पौध छायादार जगह पर तैयार करें और जल निकास का उचित प्रबन्ध रखें। फलों (आम, नीबू और अमरुद) के नऐ बाग लगाने के लिए अच्छी गुणवत्ता के पौधों का प्रबन्ध करके इनकी रोपाई जल्द करें।
पराली प्रदूषण से लड़ने के लिए पंजाब और दिल्ली की राज्य सरकार एकजुट हुई

पराली प्रदूषण से लड़ने के लिए पंजाब और दिल्ली की राज्य सरकार एकजुट हुई

पराली आज कल देश की विषम परिस्थिति एवं प्रदुषण का कारण बनी हुई है, शासन प्रशासन दोनों ही इस विषय से चिंतित है। पराली के जलाने से वायु प्रदुषण काफी मात्रा मे बढ़ता जा रहा है जो कई बिमारियों को बुलावा दे रहा है। पंजाब और दिल्ली राज्य सरकार इसको लेकर बेहद सजग है एवं इससे निपटने के लिए कदम से कदम मिलाकर साथ आ गए हैं, जिसकी जानकारी पंजाब राज्य सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल (Kuldeep Singh Dhaliwal) ने दी। धालीवाल जी ने अवगत कराया की राज्य सरकार परस्पर सहमति एवं सहयोग से पराली समस्या (यानी फसल अवशेष or Crop residue) से निजात पाने की दिशा में कार्य करने जा रही है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार पे भी निशाना साधते हुए कहा की केंद्र सरकार पूर्व में पराली से निपटने के लिए आर्थिक मदद देने के वादे से मुकर गयी है। दिल्ली राज्य सरकार के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल जी ने भी इस समस्या को गहन विचार विमर्श करते हुए प्राथमिकता दी है, क्यूंकि पराली के जलने के कारण दिल्ली का प्रदूषण काफी हद तक प्रभावित होता है। इससे दिल्ली की जनता को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पूर्व में इस प्रकार के अनुभवों के कारण दिल्ली सरकार इस समस्या को काफी गंभीरता से ले रही है।

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पंजाब व दिल्ली सरकार किसानो के लिए ४५२ करोड़ की राशि, सब्सिडी वाले कृषि यंत्रों पर देने की घोषणा कर चुकी है। आप सरकार ५००० एकड़ जमीन पर पराली के लिए पूसा बायो डीकम्पोज़र के छिड़काव का उपयोग करेगी, जो कि प्रदुषण नियंत्रण में मुख्य भूमिका निभाएगा। सरकार पराली से सम्बंधित समस्या को हर हाल में दूर करने का भरपूर प्रयास कर रही है। सरकार आधुनिक कृषि यन्त्र एवं द्रव्य पदार्धों की सहायता भी लेगी। पंजाब में धान की खेती लगभग २९-३० लाख हेक्टेयर रकबे में होने का अनुमान है, जिससे अंदाजा है की २० मिलियन टन धान की पुआल पैदा हो सकती है। पंजाब सरकार ने इस समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार से मदद मांगी थी, जिसमे केंद्र सरकार ने पंजाब और दिल्ली राज्य प्रत्येक को ३७५ करोड़ की मदद देने की बात संयुक्त प्रस्ताव में कही थी, जिसमे पंजाब व दिल्ली सरकार ने केंद्र से ११२५ का परिव्यय माँगा।

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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI ) के माध्यम से लागू की जाने वाली पायलट परियोजना के अंतर्गत लगभग २०२३ हेक्टेयर भूमि पर सरकार द्वारा बायो डीकम्पोज़र का छिड़काव किया जायेगा, जिसमे धालीवाल जी ने कुछ जगहों पर मुफ्त में छिड़काव करने की भी बात कही। दिल्ली का वातावरण अत्यधिक यातायात व वाहनों के धुएं से प्रदूषित तो होता ही है, पराली जलाने के कारण और भी दूषित हो जाता है। दिल्ली व पंजाब सरकार किसान हित में योजना बनाने की तैयारी में है ,लेकिन इसके लिए राज्य सरकार के पास पर्याप्त धनकोष नहीं है। इसलिए पंजाब व दिल्ली राज्य सरकार को केंद्र से आर्थिक सहायता की आवश्यक्ता है, जिसके लिए केंद्र सरकार इंकार कर देती है। उपरोक्त में धालीवाल जी ने केंद्र पर आर्थिक मदद न करने का आरोप लगाया है।
सही लागत-उत्पादन अनुपात को समझ सब्ज़ी उगाकर कैसे कमाएँ अच्छा मुनाफ़ा, जानें बचत करने की पूरी प्रक्रिया

सही लागत-उत्पादन अनुपात को समझ सब्ज़ी उगाकर कैसे कमाएँ अच्छा मुनाफ़ा, जानें बचत करने की पूरी प्रक्रिया

सही लागत-उत्पादन अनुपात के अनुसार सब्ज़ी की खेती

भारत शुरुआत से ही एक कृषि प्रधान देश माना जाता है और यहां पर रहने वाली अधिकतर जनसंख्या का कृषि ही एक प्राथमिक आय का स्रोत है। पिछले कुछ सालों से बढ़ती जनसंख्या की वजह से बाजार में कृषि उत्पादों की बढ़ी हुई मांग, अब किसानों को जमीन पर अधिक दबाव डालने के लिए मजबूर कर रही है। इसी वजह से कृषि की उपज कम हो रही है, जिसे और बढ़ाने के लिए किसान लागत में बढ़ोतरी कर रहें है। यह पूरी पूरी चक्रीय प्रक्रिया आने वाले समय में किसानों के लिए और अधिक आर्थिक दबाव उपलब्ध करवा सकती है। भारत सरकार के किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर अब कृषि उत्पादों में नए वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकों की मदद से लागत को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। धान की तुलना में सब्जी की फसल में, प्रति इकाई क्षेत्र से किसानों को अधिक मुनाफा प्राप्त हो सकता है। वर्तमान समय में प्रचलित सब्जियों की विभिन्न फसल की अवधि के अनुसार, अलग-अलग किस्मों को अपनाकर आय में वृद्धि की जा सकती है। मटर की कुछ प्रचलित किस्म जैसा की काशी उदय और काशी नंदिनी भी किसानों की आय को बढ़ाने में सक्षम साबित हो रही है। सब्जियों के उत्पादन का एक और फायदा यह है कि इनमें धान और दलहनी फसलों की तुलना में खरपतवार और कीट जैसी समस्याएं कम देखने को मिलती है। सब्जियों की नर्सरी को बहुत ही आसानी से लगाया जा सकता है और जलवायुवीय परिवर्तनों के बावजूद अच्छा उत्पादन किया जा सकता है।


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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) के अनुसार भारत की जमीन में उगने वाली सब्जियों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है, जिनमें धीमी वृद्धि वाली सब्जी की फसल और तेज वृद्धि वाली सब्जियों को शामिल किया जाता है। धीमी वृद्धि वाली फसल जैसे कि बैंगन और मिर्च बेहतर खरपतवार नियंत्रण के बाद अच्छा उत्पादन दे सकती है, वहीं तेजी से बढ़ने वाली सब्जी जैसे भिंडी और गोभी वर्ग की सब्जियां बहुत ही कम समय में बेहतर उत्पादन के साथ ही अच्छा मुनाफा प्रदान कर सकती है।

कैसे करें खरपतवार का बेहतर नियंत्रण ?

सभी प्रकार की सब्जियों में खरपतवार नियंत्रण एक मुख्य समस्या के रूप में देखने को मिलता है। अलग-अलग सब्जियों की बुवाई के 20 से 50 दिनों के मध्य खरपतवार का नियंत्रण करना अनिवार्य होता है। इसके लिए पलवार लगाकर और कुछ खरपतवार-नासी रासायनिक पदार्थों का छिड़काव कर समय-समय पर निराई गुड़ाई कर नियंत्रण किया जाना संभव है। जैविक खाद का इस्तेमाल, उत्पादन में होने वाली लागत को कम करने के अलावा फसल की वृद्धि दर को भी तेज कर देता है।

कैसे करें बेहतर किस्मों का चुनाव ?

किसी भी सब्जी के लिए बेहतर किस्म के बीज का चुनाव करने के दौरान किसान भाइयों को ध्यान रखना चाहिए कि बीज पूरी तरीके से उपचारित किया हुआ हो या फिर अपने खेत में बोने से पहले बेहतर बीज उपचार करके ही इस्तेमाल करें। इसके अलावा किस्म का विपणन अच्छे मूल्य पर किया जाना चाहिए, वर्तमान में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बीज निर्माता कंपनियां अपने द्वारा तैयार किए गए बीज की संपूर्ण जानकारी पैकेट पर उपलब्ध करवाती है। उस पैकेट को पढ़कर भी किसान भाई पता लगा सकते हैं कि यह बीज कौन से रोगों के प्रति सहनशील है और इसके बीज उपचार के दौरान कौन सी प्रक्रिया का पालन किया गया है। इसके अलावा बाजार में बिकने वाले बीज के साथ ही प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में होने वाले अनुमानित उत्पादकता की जानकारी भी दी जाती है, इस जानकारी से किसान भाई अपने खेत से होने वाली उत्पादकता का पूर्व अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसे ही कुछ बेहतर बीजों की किस्मों में लोबिया सब्जी की किस्में काशी चंदन को शामिल किया जाता है, मटर की किस्म काशी नंदिनी और उदय के अलावा भिंडी की किस्म का काशी चमन कम समय में ही अधिक उत्पादकता उपलब्ध करवाती है।

कैसे निर्धारित करें बीज की बुवाई या नर्सरी में तैयार पौध रोपण का सही समय ?

किसान भाइयों को सब्जी उत्पादन में आने वाली लागत को कम करने के लिए बीज की बुवाई का सही समय चुनना अनिवार्य हो जाता है। समय पर बीज की बुवाई करने से कई प्रकार के रोग और कीटों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है और फसल की वर्द्धि भी सही तरीके से हो जाती है, जिससे जमीन में उपलब्ध पोषक तत्वों का इस्तेमाल फसल के द्वारा ही कर लिया जाता है और खरपतवार का नियंत्रण आसानी से हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों की राय में मटर की बुवाई नवंबर के शुरुआती सप्ताह में की जानी चाहिए, मिर्च और बैंगन जुलाई के पहले सप्ताह में और टमाटर सितंबर के पहले सप्ताह में बोये जाने चाहिए।

कैसे करें बीज का बेहतर उपचार ?

खेत में अंतिम जुताई से पहले बीज का बेहतर उपचार करना अनिवार्य है, वर्तमान में कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ जैसे कि थायो-मेथोक्जम ड्रेसिंग पाउडर से बीज का उपचार करने पर उसमें कीटों का प्रभाव कम होता है और अगले 1 से 2 महीने तक बीज को सुरक्षित रखा जा सकता है।


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कैसे करें सब्जी उत्पादन में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल ?

वर्तमान में कई वैज्ञानिक अध्ययनों से नई प्रकार की तकनीक सामने आई है, जो कि निम्न प्रकार है :-
  • ट्रैप फसलों (Trap crop) का इस्तेमाल करना :

इन फसलों को 'प्रपंच फसलों' के नाम से भी जाना जाता है।

मुख्यतः इनका इस्तेमाल सब्जी की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से बचाने के लिए किया जाता है।

पिछले 10 वर्षों से कृषि क्षेत्र में सक्रिय कृषि वैज्ञानिक 'नीरज सिंह' के अनुसार यदि कोई किसान गोभी की सब्जी उगाना चाहता है, तो गोभी की 25 से 30 पंक्तियों के बाद, अगली दो से तीन पंक्तियों में सरसों का रोपण कर देना चाहिए, जिससे उस समय गोभी की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले डायमंडबैक मॉथ और माहूँ जैसे कीट सरसों पर आकर्षित हो जाते हैं, इससे गोभी की फसल को इन कीटों के आक्रमण से बचाया जा सकता है।

इसके अलावा टमाटर की फसल के दौरान गेंदे की फसल का इस्तेमाल भी ट्रैप फसल के रूप में किया जा सकता है।

  • फेरोमोन ट्रैप (pheromone trap) का इस्तेमाल :

इसका इस्तेमाल मुख्यतः सब्जियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को पकड़ने में किया जाता है।

गोभी और कद्दू की फसलों में लगने वाला कीट 'फल मक्खी' को फेरोमोन ट्रैप की मदद से आसानी से पकड़ा जा सकता है।

इसके अलावा फल छेदक और कई प्रकार के कैटरपिलर के लार्वा को पकड़ने में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।



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हाल ही में बेंगुलुरू की कृषि क्षेत्र से जुड़ी एक स्टार्टअप कम्पनी के द्वारा तैयार की गई चिपकने वाली स्टिकी ट्रैप (या insect glue trap) को भी बाजार में बेचा जा रहा है, जो आने वाले समय में किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। आशा करते हैं Merikheti.com के द्वारा उपलब्ध करवाई गई यह जानकारी बदलते वक्त के साथ बढ़ती महंगाई और खाद्य उत्पादों की मांग की आपूर्ति सुनिश्चित करने में किसान भाइयों की मदद करने के अलावा उन्हें मुनाफे की राह पर भी ले जाने में भी सहायक होगी।
पूसा परिसर में बिल गेट्स ने किया दौरा, खेती किसानी के प्रति व्यक्त की अपनी रुची

पूसा परिसर में बिल गेट्स ने किया दौरा, खेती किसानी के प्रति व्यक्त की अपनी रुची

गेट्स फाउंडेशन के चेयरमैन ब‍िल गेट्स (Bill Gates) द्वारा पूसा कैंपस में गेहूं एवं चने की उन प्रजातियों की फसलों के विषयों में जाना जो जलवायु पर‍िवर्तन की जटिलताओं का सामना करने में समर्थ हैं। विश्व के अरबपति बिल गेट्स (Bill Gates) द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) का भृमण करते हुए, यहां के पूसा परिसर में तकरीबन डेढ़ घंटे का समय व्यतीत किया एवं खेती व जलवायु बदलाव के विषय में लोगों से विचार-विमर्श किया।

बिल गेट्स ने कृषि क्षेत्र में अपनी रुची जाहिर की

आईएआरआई के निदेशक ए.के. सिंह द्वारा मीडिया को कहा गया है, कि बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सह-अध्यक्ष एवं ट्रस्टी बिल गेट्स (Bill Gates) द्वारा आईएआरआई के कृषि-अनुसंधान कार्यक्रमों, प्रमुख रूप से जलवायु अनुकूलित कृषि एवं संरक्षण कृषि में गहन रुचि व्यक्त की।

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इसी मध्य गेट्स (Bill Gates) द्वारा आईएआरआई की जलवायु में बदलाव सुविधा एवं कार्बन डाइऑक्साइड के उच्च पैमाने के सहित खेतों में उत्पादित की जाने वाली फसलों के विषय में जानकारी अर्जित की है। बिल गेट्स ने मक्का-गेहूं फसल प्रणाली के अंतर्गत सुरक्षित कृषि पर एक कार्यक्रम में भी मौजूदगी दर्ज की। गेट्स ने संरक्षण कृषि के प्रति अपनी विशेष रुचि व्यक्त की। उसकी यह वजह है, कि गेट्स का एक लक्ष्य विश्व स्तर पर कुपोषण की परेशानी का निराकरण करना है। इसलिए ही वह स्थायी कृषि उपकरण विकसित करने के लिए निवेश कर रहे हैं। बिल गेट्स द्वारा खेतों में कीड़ों एवं बीमारियों की निगरानी हेतु आईएआरआई द्वारा विकसित ड्रोन तकनीक समेत सूखे में उत्पादित होने वाले छोले पर हो रहे एक कार्यक्रम को ध्यानपूर्वक देखा।

बिल गेट्स (Bill Gates) ने दौरा करने के बाद क्या कहा

संस्थान के निदेशक डॉ. अशोक कुमार स‍िंह द्वारा गेट्स के दौरा को कृषि अध्ययन एवं जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में कारगर कदम बताया है। गेट्स का कहना है, क‍ि देश में कृष‍ि के राष्ट्रीय प्रोग्राम अपनी बेहद अच्छी भूमिका निभा रहे हैं। फाउंडेशन से जुड़कर कार्य करने एवं सहायता लेने हेतु योजना निर्मित कर दी जाएगी। जलवायु परिवर्तन, बायोफोर्टिफिकेशन से लेकर फाउंडेशन सहयोग व मदद करेगा तब और बेहतर होगा। आईएआरआई को जीनोम एडिटिंग की भाँति नवीन विज्ञान के इलाकों में जीनोम चयन एवं मानव संसाधन विकास का इस्तेमाल करके पौधों के प्रजनन के डिजिटलीकरण पर परियोजनाओं हेतु धन उपलब्ध कराया जाएगा।